शराब गृह क्लेश को जन्म देती है व आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक बदहाली अपने साथ लेकर आती है।
इससे दूरी रखना ही समझदारी है। अधिक जानकारी के लिए देखें श्रद्धा टीवी चैनल पर दोपहर 2:00 से
अगर मांस खाने से परमात्मा की प्राप्ति होती तो सबसे पहले मास खाने वाले जनवरो को होती, जो केवल मास ही खाते है, मांस खाने वाले परमात्मा के बताए विधान को तोड़ कर दोषी बन रहे है !! @SaintRampalJiM https://t.co/4fLxc4w0Kf
अन्य संतों द्वारा सृष्टि रचना की दन्त कथा‘ अन्य संतों द्वारा जो सृष्टि रचना का ज्ञान बताया है वह कैसा है?कृप्या निम्न पढ़ें :- सृष्टि रचना के विषय में राधास्वामी पंथ के सन्तों के वधन-धन सतगुरू पंथ के सन्त के विचार :-पवित्रा पुस्तक जीवन चरित्रा परम संत बाबा जयमल सिंह जी महाराज‘‘ पृष्ठ नं.102-103 से ‘‘सृष्टि की रचना‘‘ (सावन कृपाल पब्लिकेशन, दिल्ली)‘‘पहले सतपुरुष निराकार था, फिर इजहार (आकार) में आया तो ऊपर के तीन निर्मलमण्डल (सतलोक, अलखलोक, अगमलोक) बन गया तथा प्रकाश तथा मण्डलों का नाद(धुनि) बन गया।‘‘पवित्रा पुस्तक सारवचन (नसर) प्रकाशक :- राधास्वामी सत्संग सभा, दयालबागआगरा, ‘‘सृष्टि की रचना‘‘ पृष्ठ 8 रू.‘‘प्रथम धूंधूकार था। उसमें पुरुष सुन्न समाध में थे। जब कुछ रचना नहीं हुई थी। फिरजब मौज हुई तब शब्द प्रकट हुआ और उससे सब रचना हुई, पहले सतलोक और फिरसतपुरुष की कला से तीन लोक और सब विस्त्तार हुआ।‘‘यह ज्ञान तो ऐसा है जैसे एक समय कोई बच्चा नौकरी लगने के लिए साक्षात्कार(इन्टरव्यू) के लिए गया। अधिकारी ने पूछा कि आप ने महाभारत पढ़ा है। लड़के नेउत्तर दिया कि उंगलियों पर रट रखा है। अधिकारी न...
पूंजीवादने की पर्यावरण की अपरिमित हानि ! पूंजीवादद्वारा हुई पर्यावरण की अपरिमित हानि कभीभी भरनेवाली नहीं है । पोन यू नामक चीनी तज्ञ का कहना है कि, ‘यूरोपने पिछली शताब्दी में विकास के नामपर पर्यावरण का जितना विनाश किया, उतना विनाश हमने तीन दशकों में किया है ।’ विज्ञानके कारण हुए प्रदूषणसे विश्व पर्यावरण धोखेमें ! ‘नोबेल पारितोषिक’ विजेता ‘अर्नेस्य’ने ३१.१.२००३ को नई दिल्लीमें हुए ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थामें’ ‘शोध एवं शिक्षासे परे हमारे सामाजिक कर्तव्य’के विषयपर बोलते हुए कहा, ‘मुक्त अर्थव्यवस्थामें आज केवल मूल्य नहीं अपितु केवल लाभ ही महत्त्वपूर्ण होनेसे नैतिक प्रदूषण निर्माण हुआ है । नैतिक प्रदूषण इतना अधिक हो गया है कि, इस अधःपतनके कारण समाजकी प्रकृतिके विषयमें गैरजिम्मेदारी बढ गई है, उसी कारण जागतिक पर्यावरण संकटमें आ गया है ।’ प्रकृतिपर मानव अत्याचार करेगा, तो प्रकृति भी उसका बदला लेगी ! ‘प्रकृतिपर मानव अत्याचार करेगा, तो प्रकृति भी उसका बदला लेगी । उर्जा का अभाव, अनावृष्टि, अकाल, वांशिक संघर्ष, नैतिक अधःपतन, भीषण रोगों का प्रादुर्भाव तथा अंत में महायुद्ध ! वर्षा...
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